STATUE OF HINDU GOD
Kushan period

Kushan period

कुषाण काल

कुषाण साम्राज्य में निर्मित मूर्तियाँ मूर्तिकला का अद्भुत उदहारण है। साम्राज्यवाद का कुषाण युग, इतिहास का एक महानतम आंदोलन रहा है, यह उत्तर पूर्वी भारत तथा पश्चिमी पाकिस्तान, (वर्तमान अफ़ग़ानिस्तान) तक फैला था। ईसवीं की पहली शताब्दी से तीसरी शताब्दी के बीच कुषाण एक राजनीतिक सत्ता के रूप में विकसित हुए और उन्होंने इस दौरान अपने राज्य में कला का बहुमुखी विकास किया। भारतीय कला जगत् का परिपक्व युग यहीं से प्रारंभ होता है।

गांधार मूर्तिकला शैली

गांधार मूर्तिकला की सबसे उत्कृष्ट मूर्ति वह है- जिसमें बुद्ध को एक योगी के रूप में बैठे हुए दिखाया गया था। एक संन्यासी के वस्त्र पहने उनका मस्तक इस तरह से दिखायी दे रहा है। जैसे उसमें आध्यात्मिक शक्ति बिखर रही हो, बड़ी-बड़ी आँखे, ललाट पर तीसरा नेत्र और सिर पर उभार। ये तीनों संकेत यह दिखाते हैं कि वह सब सुन रहे हैं, सब देख रहे हैं और सब कुछ समझ रहे हैं।

बुद्ध के तीन रूप

यद्यपि बुद्ध के ये तीनों रूप विदेशी कला द्वारा भी प्रभावित हैं। बहरहाल शुद्ध रूप से भारतीय प्रतीत होती यह मूर्ति यह दर्शाती है कि कला घरेलू और विदेशी तत्वों का मिलाजुला रूप है। गांधार क्षेत्र की कला के जो महत्त्वपूर्ण तत्व हैं और उनकी जो शक्ति है- वह उत्तर पश्चिमी भारत की बौद्ध कला में देखी जा सकती है और यह प्राचीन देवताओं का प्रतिनिधित्व एवं उनके रूप दिखाती हैं। इसी तरह का प्रभाव खुदाई से निकले पत्थरों में भी देखा जा सकता है, यह पत्थर चाहे अपनी कलात्मक शैली या अपने दैवीय रूप को दिखाते हों लेकिन उनका रोमन वास्तुकला से साम्राज्यवादी समय से ही गहरा संबंध रहा है, मूर्ति की स्थिति, शरीर का आकार और उसका वास्तु ढांचा स्पष्टत: रोमन मॉडल पर ही आधारित है।

मथुरा शैली

ईसा काल की प्रथम तीन शताब्दियाँ मथुरा शैली मूर्तिकला का स्वर्णिक काल हैं। महायान बौद्ध धर्म के नये आदर्शों ने तत्कालीन मूर्ति शिल्पकारों को प्रेरित किया था। भारतीय पुरातत्वशास्त्रियों के अनुसार, बुद्ध मूर्तियों का निर्माण इस शैली के कलाकारों का महान् योगदान है। इन मूर्तियों में प्रयुक्त पत्थर सफेद-लाल था, जो शताब्दियों तक अपनी उत्कृष्ट कलात्मक गुणवत्ता के रूप में विद्यमान रहा। यह शैली जैनों ग्रीकों एवं रोमनों की शैलियों से भी प्रभावित थी। जैन शैली द्वारा प्रभावित एक स्तूप की रेलिंग में चित्रित एक आकर्षक महिला की आकृतिया जो अत्यधिक आभूषणों से यिक्त है, प्राचीन भारतीय कला की यादगार और उल्लेखनीय कलाकृति सन्न्यास और धर्मपरायणता के सन्दर्भ में मठ की की इन मूर्तियों में कहीं भी अश्लीलता और कामोत्तेंना की भावभंगिमा नहीं दिखायी देती है।

भारतीय कला के इतिहास, मथुरा की कुषाण कला में इसलिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उसने प्रतीकवाद और मूर्ति शिल्पवाद को अपनाया और बाद में उसे स्वीकार कर लिया। उदाहरण के लिए, पहली बार मथुरा में देवी-देवताओं की मूर्तियों की रचना की गयी। बुद्ध मूर्तियों का प्रभाव चारों ओर फैला और चीन के कला केंन्द्रों तक पहुंचा। इस शैली की कुछ उल्लेखनीय कलाकृतियों में वेमा कदफीज और कनिष्क की मूर्तियाँ, महिलाओं के चित्र सहित अनेक रेलिंग स्तंभ, बैठे हुए कुबेर एवं ध्यानरत बौद्ध प्रतिमाएं प्रमुख हैं।

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