STATUE OF HINDU GOD
बुद्ध की प्रतिमाएं

बुद्ध की प्रतिमाएं

बुद्ध की प्रतिमाएं

गुप्तकालीन मूर्तिशिल्प में बुद्ध धर्म का शांति आदर्श अत्यंत भव्यता से बुद्ध की मूर्तियों में अभिव्यक्त हुआ है। उनके चहरे की भाव मुद्रा और मुस्कान उस परम समरसता की अनुभूति को दर्शाती है, जिसे उस महाज्ञानी ने प्राप्त किया था। इन मूर्तियों के शिल्प की हर रेखा में सौंदर्य और भाव का परम्परागत स्वरूप दर्शाया गया है। कायिक स्थिति, हस्त मुद्राएं और अन्य सभी लक्षण प्रवृति-प्रतीकों के रूप में उपस्थित हैंमस्तक अंडाकार भौंहे कमान जैसी, पलकें कमल की पंखुड़ियां, अधर आम्रफल की तरह, कंधों की गोलाई हस्तिशुण्ड जैसी, कटि सिंह की और उंगलियां फूलों जैसी।

सांची के विशाल स्तूप के प्रवेश द्वारों पर पांचवी सदी में रखी गयी बुद्ध की चार प्रतिमाएं उस कोमलता, लालित्य और प्रशांति को दर्शाती हैं, जो समृद्ध और परिपक्व गुप्तकालीन शिल्प विधा की विशेषताएं हैं। बुद्ध की काया की रूपरेखाओं में दर्शित लालित्यपूर्ण अनुकूलन मूर्तिशिल्प के उस विकास क्रम को व्यक्त करता है, जिसे प्रारंभिक गुप्तकालीन कोणीय स्वरूप का अगला चरण कहा जा सकता है। बुद्ध की प्रतिमाएं मथुरा में भी मिली हैं, जो बौद्ध धर्म का सुसम्पन्न केन्द्र रहा था। इनमें एक सबसे प्राचीन प्रतिमा 5वीं सदी ई. की है, जो पूर्ववर्ती प्रतिमाओं के भारी आयतन अपनाने के बावजूद कुषाणकालीन आदिरूपों से दृष्टियों से भिन्न है। शाक्यमुनि की उत्कीर्ण उत्तिष्ठ मुद्रा में प्रतिमा पूर्णत: भिक्षु के परिधान में हैं, जिसकी तहें समानांतर छल्लों में दर्शित हैं। बुद्ध के सिर की पीछे प्रभामंडल भी बनाया गया है। इस काल में बौद्ध मूर्तिशिल्प का एक अन्य सक्रिय केन्द्र सारनाथ था, जहाँ बुद्ध की खड़ी और बैठी प्रतिमाएं बनाई गई। सारनाथके खंडहरों में मिली बुद्ध की अपेक्षाकृत अधिक उभार वाली मूर्ति को गुप्तकालीन मूर्तिकला का सर्वसुंदर और भव्य प्रतिमान कहा जा सकता है। हल्के रंग के बुलई पत्थर से बनी इस प्रतिमा में बुद्ध को बैठकर अपना प्रथम उपदेश देते हुए दर्शाया गया है। प्रतिमा की पीठिका के नीचे घुटनों के बल झुके हुए दो भिक्षुक को न्यायचक्र की पूजा करते दिखाया गया है। इस न्याय चक्र को बुद्धि का प्रतीक मानते हैं। सारनथ की इस बुद्ध प्रतिमा में उत्कृष्टता से चित्रित प्रभामंडल इसकी विशेषता है।

यद्यपि भित्तिचित्र अजंता की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कलाकृतियां हैं, पर गुहा मन्दिर का स्थापत्य शिल्प और प्रवेश द्वारों पर नक़्क़ाशी भी असाधरण है। इन मंदिर में जो शैलियां मूलरूप से चिनाई और काष्ठ कला रोपों में विकसित हुई, उन्हें समकालिन चट्टानों से तराश गया था। ये कृतियाँ असंख्य और विविध शैली की हैं और इन्हें बिना किसी एकीकृत नियोजन के प्रवेश अग्रभागों पर अंकित किया गया है।

पाल मूर्तिकला शैली

  • पाल शैली की विशेषता इसकी मूर्तियों में परिलक्षित अंतिम परिष्कार है।
  • बिहार और बंगाल के पाल और सेन शासकों के समय में बौद्ध और हिंदू दोनों ने ही सुंदर मूर्तियाँ बनाई।
  • इस मूर्तियों के लिए काले बैसाल्ट पत्थरों का प्रयोग किया गया है।
  • मूर्तियां अतिसज्जित और अच्छी पॉलिश की हुई हैं- मानो वे पत्थर की न होकर धातु की बनी हों।

होयसल मूर्तिकला शैली

मुख्य लेख : होयसल मूर्तिकला शैली

होयसल शैली (1050-1300ई) का विकास कर्नाटक के दक्षिण क्षेत्र में हुआ। ऐसा कहा जा सकता है कि होयसल कला आरंभ ऐहोल, बादामी और पट्टदकल के प्रारंभिक चालुक्य कालीन मंदिरों में हुआ, लेकिन मैसूर क्षेत्र में विकसित होने के पश्चात् ही इसका विशिष्ट स्वरूप प्रदर्शित हुआ, जिसे होयसल शैली के नाम से जाना गया। अपनी प्रसिद्धि के चरमकाल में इस शैली की एक प्रमुख विशेषता स्थापत्य की योजना और सामान्य व्यवस्थापन से जुड़ी है।

होयसल मंदिर

वास्तविक वास्तुयोजना के हिसाब से होयसल मंदिर केशव मन्दिर और हलेबिड के मन्दिर सोमनाथपुर और अन्य दूसरों से भिन्न हैं। स्तम्भ वाले कक्ष सहित अंतर्गृह के स्थान पर इसमें बीचो बीच स्थित स्तंभ वाले कक्ष के चारों तरफ बने अनेक मंदिर हैं, जो तारे की शक्ल में बने हैं।

कई मंदिरों में दोहरी संरचना पायी जाती है। इसके प्रमुख अंग दोहैं और नियोजन में प्राय: तीन चार और यहाँ तक कि पांच भी हैं। हर गर्भगृह के ऊपर बने शिखर को जैसे-जैसे ऊपर बढ़ाया गया है, उसमें आड़ी रेखाओं और सज्जा से नयापन लाया गया हैं, जो शिखर को कई स्तरों में बांटते हैं और यह धारे-धीरे कम घेरे वाला होता जाता है। वस्तुत: होयसल मंदिर की एक विशिष्टता संपूर्ण भवन की सापेक्ष लघुता है।

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