STATUE OF HINDU GOD
गुप्तकालीन मूर्तिकला

गुप्तकालीन मूर्तिकला

गुप्तकालीन मूर्तिकला

भारतीय कला के इतिहास में गुप्त काल को इसलिए महान् युग कहा जाता है- क्योंकि कलाकृतियों की संपूर्णता और परिपक्वता जैसी चीज़ें इससे पहले कभी नहीं रहीं। इस युग की कलाकृतियों मूर्तिशिल्प, शैली एवं संपूर्णता, सुंदरता एवं संतुलन जैसे अन्य कला तत्वों से सुसज्जित हुई।

गुप्त धर्म से ब्राह्मण थे और उनकी भक्ति विशेष रूप से विष्णु में थी, किंतु उन्होंने बौद्ध धर्म और जैन धर्म के लिए भी उदारता दिखायी। पौराणिक हिंदू धर्म में तीन देवता हैं विष्णु, शिव एवं शक्ति। शिव के प्रति उनमें विशेष अनुराग था यानी शिव अग्रणी देवता थे। यद्यपि दक्षिण और पूर्व में शैववाद का विकास हुआ तथा दक्षिण-पश्चिम मालाबार के कुछ भागों में एवं पूर्वी भारत में शक्तिवाद का विकास हुआ कृष्ण पर आधारित वैष्णववाद था जो मुख्यत: भारत के उत्तरी एवं मध्यम भाग में केंद्रित रहा। इन सभी धार्मिक देवताओं की पूजा सब जगह होती रही और उनके मन्दिर एवं उनकी मूर्तियाँ सब जगह प्रतिष्ठापित हुई।

गुप्त कला अध्यात्मिक गुणों से युक्त है और उसकी दृष्टि भी जीवन की गहन सच्चाई को दर्शाती है। यद्यपि गुप्तकाल का प्रारंभिक दौर हिंदू कला पर ज़ोर देता है, जबकि बाद का युग बौद्ध कला का शिखर युग है, जो सभी प्राचीन कलाओं और उनकी मनोभावना व गुणवत्ता का द्योतक है। हिंदू कला ने चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल के दौरान विदिशा अंचल में ही उन्नति की।

मूर्तियाँ

गुप्त मूर्ति कला की सफलता प्रारंभिक मध्यकाल की प्रतीकात्मक छवि एवं कुषाण युग की कलापूर्ण छवि के मध्य निर्मित एक संतुलन पर आधारित हैं।

हिंदू, बौद्ध एवं जैन कलाकृतियाँ मध्य भारत सहित देश के अनेक भागों में पायीं। ये मूर्तिकला में अद्वितीय हैं। बेसनगर से गंगा की मूर्ति, ग्वालियर से उड़ती हुई अपस्राओं की मूर्ति, सोंडानी से मिली हवा में लहराते गंधर्व युगल की मूर्ति, खोह से प्राप्त एकमुख लिंग और भुमारा से अन्य कई प्रकार की मिली मूर्तियाँ उसी सुंदरता, परिकल्पना और संतुलन को प्रदर्शित करती हैं। जैसा कि सारनाथ में देखा जाता है।

भगवान हरिहर[2] की मानवाकार प्रतिमा मध्य प्रदेश में मिली है। अनुमान है यह पांचवी ईस्वी के पूर्वाद्ध की रचना है। विष्णु का आठवां अवतार कहे गए कृष्ण की प्रतिमाएं भी 5 वीं सदी ई. के आरंभिक काल से मिल रही हैं। वाराणसी से प्राप्त एक मूर्ति में उन्हें कृष्ण गोवर्धनधारी के रूप में अंकित किया गया है। जिसमें उन्हें बाएं हाथ के सहारे गोवर्धन पर्वत उठाए दिखाया गया है। जिसके नीचे वृंदावनवासी जल प्रलय से बचने के लिए एकत्रित हुए थे। वह भयावह जलवृष्टि इंद्र ने भेजी थी, जो वृंदावन वासियों की अपने प्रति उपेक्षा से क्रोधित हो उठे थे।

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